नई दिल्ली/लखनऊ। केंद्रीय बजट 2026–27 सामने आते ही किसान संगठनों की प्रतिक्रिया तेज हो गई है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता Rakesh Tikait ने बजट को किसानों की अपेक्षाओं से दूर बताया है। उनका कहना है कि किसानों की लंबे समय से चली आ रही प्रमुख मांगें बजट में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दीं।
सबसे बड़ा मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी को लेकर है। टिकैत के अनुसार यदि एमएसपी को कानून का दर्जा मिलता, तो किसानों को फसल बेचते समय बाजार की अनिश्चितता से राहत मिलती। लेकिन बजट में इस संबंध में कोई ठोस प्रावधान सामने नहीं आया।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाने की भी मांग की जा रही थी। किसान संगठनों का तर्क है कि खेती की लागत — जैसे डीजल, खाद, बीज और मजदूरी — तेजी से बढ़ी है, इसलिए प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता बढ़ाना जरूरी था।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार, डिजिटल खेती, कोल्ड स्टोरेज और सप्लाई चेन मजबूत करने की बात कही। हालांकि किसान नेताओं का कहना है कि इन योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब किसानों को उनकी उपज का सुनिश्चित और लाभकारी मूल्य मिलेगा।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों में इस मुद्दे पर बैठकें शुरू हो गई हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस विषय पर संयुक्त रणनीति बनाई जा सकती है। फिलहाल बजट के बाद किसान राजनीति फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई है।
