2006 में नोएडा के निठारी गांव से बच्चों और युवतियों के रहस्यमय ढंग से गायब होने और बाद में मानव अवशेष मिलने से देशभर में सनसनी फैल गई थी। नाले के पास दर्जनों कंकाल, शरीर के अंग, कपड़े और जूते मिलने के बाद यह मामला भारत के सबसे चर्चित क्राइम केसों में बदल गया। जांच में निठारी के कारोबारी मोनिंदर सिंह पंधेर के घर का कुक सुरेंद्र कोली मुख्य संदिग्ध के रूप में सामने आया और दोनों को गिरफ्तार किया गया।सीबीआई ने जांच संभालते ही कई अलग-अलग केस बनाए—किडनैपिंग, हत्या, शव नष्ट करना, यौन शोषण सहित कई गंभीर धाराएँ लगाई गईं। कई ट्रायल कोर्टों ने कोली को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई, जबकि पंधेर कुछ मामलों में बरी और कुछ में दोषी ठहरा। वर्षों तक यह मामला फोरेंसिक सबूतों, गवाहों और जांच की गुणवत्ता को लेकर विवादों में रहा।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ अंतिम लंबित मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों की कस्टडी चेन टूटी थी,फोरेंसिक रिपोर्टों में स्पष्ट लिंक नहीं था,गवाहियों में गंभीर विरोधाभास थे,और पूरी जांच “संदेह के घेरे” में थी।कोर्ट ने कहा कि केवल शक के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। यही कारण रहा कि सुरेंद्र कोली को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया और तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।
कौन जेल में था, कौन छूटा?सुरेंद्र कोली:
18 वर्ष जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से बरी, रिहा।मोनिंदर सिंह पंधेर: कई मामलों में पहले ही बरी, कुछ मामलों में सजा; लेकिन अब अंतिम केस के फैसले से उसके खिलाफ भी कानूनी दबाव कम हुआ है।फैसले का असरइस फैसले ने पूरे निठारी केस की जांच प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं—फोरेंसिक सिस्टम, पुलिस जांच, गवाह संरक्षण और अभियोजन की कमियाँ अब खुलकर सामने आ गई हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में वैज्ञानिक तरीके से प्रमाण जुटाना ही न्याय का आधार होना चाहिए।
