नई दिल्ली। भारत में अपराध जांच व्यवस्था को पारंपरिक तरीकों से निकालकर वैज्ञानिक साक्ष्यों की दिशा में ले जाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि आने वाले पाँच वर्षों में देशभर में फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं का एक सुदृढ़ और परस्पर जुड़ा हुआ नेटवर्क विकसित किया जाएगा, जिस पर सरकार 30,000 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है। इस परियोजना का संचालन नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी (NFSU) और केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाओं के सहयोग से किया जाएगा।
घोषणा के दौरान शाह ने कहा कि अब जांच प्रक्रिया में वैज्ञानिक साक्ष्य, डिजिटल रिकॉर्ड और तकनीकी विश्लेषण को केंद्रीय भूमिका दी जाएगी। उन्होंने बताया कि देश के विभिन्न राज्यों में स्थापित होने वाली नई प्रयोगशालाओं को केंद्रीय डेटा सिस्टम से जोड़ा जाएगा, ताकि एफआईआर, अपराध इतिहास, साक्ष्य रिपोर्ट और जांच संबंधी फाइलें एकीकृत प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रहें। गृह मंत्री के अनुसार, लाखों पुराने अपराध अभिलेख और बड़ी संख्या में एफआईआर डेटा पहले ही राष्ट्रीय सर्वर से लिंक किए जा चुके हैं, जिससे अपराध पैटर्न और संदिग्ध नेटवर्क का विश्लेषण तेज हुआ है।
परियोजना के अंतर्गत राज्यस्तरीय, क्षेत्रीय और विशेष श्रेणी की फोरेंसिक लैबों को चरणबद्ध रूप से विकसित किया जाएगा। नई प्रयोगशालाओं में डीएनए परीक्षण, डिजिटल फॉरेंसिक, साइबर एविडेंस, नार्कोटिक विश्लेषण और अपराध स्थल विज्ञान जैसे उन्नत विभाग स्थापित करने की रूपरेखा तैयार की गई है। शाह ने कहा कि अब लक्ष्य यह है कि आने वाले समय में कोई भी राज्य ऐसा न रहे, जहाँ फोरेंसिक यूनिवर्सिटी या आधुनिक लैब संरचना उपलब्ध न हो।
गृह मंत्री ने स्वीकार किया कि अब तक जांच एजेंसियों को कई मामलों में प्रयोगशाला सुविधाओं की कमी, रिपोर्ट में देरी और मानकीकृत तकनीक के अभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। नए नेटवर्क से, उनके अनुसार, न केवल जांच की गति बढ़ेगी बल्कि अदालतों में प्रस्तुत साक्ष्यों की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी मजबूत होगी। परियोजना को आपराधिक न्याय प्रणाली में संरचनात्मक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

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