लखनऊ। बहुजन राजनीति के पुरोधा काशी राम की जयंती पर समाजवादी पार्टी द्वारा “पीडीए दिवस” मनाए जाने को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने इस पहल को आड़े हाथों लेते हुए इसे “सिर्फ राजनीतिक दिखावा” करार दिया और कहा कि जिन दलों का इतिहास बहुजन समाज के संघर्षों से मेल नहीं खाता, वे आज चुनावी लाभ के लिए प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
राजधानी लखनऊ में जारी बयान में मायावती ने कहा कि कांशीराम के विचार सामाजिक परिवर्तन और संगठन निर्माण पर आधारित थे, जबकि आज कुछ दल उनके नाम का उपयोग कर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा शासनकाल में बहुजन महापुरुषों के नाम पर स्थापित योजनाओं और स्मारकों के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई गई, और अब जयंती के अवसर पर आयोजन कर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जा रही है।
उधर, अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में कांशीराम के सामाजिक न्याय के एजेंडे को आगे बढ़ाने की बात कही। पार्टी नेताओं का दावा है कि “पीडीए”— यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक— समाज की साझी आवाज है और जयंती पर कार्यक्रम उसी भावना का विस्तार हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी चुनावों से पहले बहुजन वोट बैंक को लेकर सपा और बसपा के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। प्रदेश की सियासत में दलित-पिछड़ा समीकरण हमेशा निर्णायक रहा है, ऐसे में कांशीराम की विरासत को लेकर बयानबाज़ी का असर जमीनी राजनीति पर भी दिख सकता है।
कांशीराम ने 1980 के दशक में सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को नई दिशा दी थी और उसी विचारधारा के आधार पर बसपा का विस्तार हुआ।
