नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में अधिसूचित उच्च शिक्षा संबंधी नए नियमों को लेकर विवाद अब कानूनी मोड़ ले चुका है। इन नियमों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दाखिल की गई है, जिससे इस विषय पर चल रही राष्ट्रीय बहस और तेज हो गई है।
याचिका में मुख्य आपत्ति नियमों की उन परिभाषाओं पर जताई गई है, जो उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव और शिकायत निवारण की प्रक्रिया से जुड़ी हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि मौजूदा शब्दावली और प्रावधानों का दायरा पर्याप्त व्यापक नहीं है, जिससे सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान रूप से संरक्षण मिल पाने पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला देते हुए कहा गया है कि समानता और भेदभाव-रहित व्यवहार का सिद्धांत सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। अदालत से अनुरोध किया गया है कि नियमों के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई जाए या उनकी संवैधानिक वैधता की विस्तृत समीक्षा कराई जाए।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देशभर के विश्वविद्यालय परिसरों में इन नियमों को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। कुछ शिक्षाविद इन्हें सुरक्षित और संवेदनशील माहौल की दिशा में कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ समूह इनके प्रावधानों को अस्पष्ट बताते हुए संशोधन की मांग कर रहे हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि इन नियमों का मौजूदा स्वरूप बरकरार रहेगा या इनमें किसी प्रकार का संशोधन आवश्यक माना जाएगा। केंद्र सरकार और UGC की ओर से जवाब दाखिल होने के बाद इस कानूनी विवाद की दिशा और स्पष्ट होगी।

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