प्रयागराज / मुज़फ्फरनगर। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की तलाशी और जब्ती से जुड़ी कार्यवाही पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि अब किसी भी बरामदगी, छापामारी या तलाशी अभियान को बिना वीडियोग्राफी के अंजाम नहीं दिया जा सकता। अदालत ने इसे जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और साक्ष्यों की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक बताया है।
यह मामला मुज़फ्फरनगर के मंसूरपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां पुलिस ने चोरी की कई मोटरसाइकिलों की बरामदगी का दावा किया था। सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि बरामदगी स्थल की कोई ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग प्रस्तुत नहीं की गई। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में वीडियोग्राफी न होना गंभीर कमी मानी जाएगी, क्योंकि इससे बरामदगी के दावे संदेह के दायरे में आ जाते हैं।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 105 के अनुसार तलाशी-जब्ती से संबंधित एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की जाए और उसे सभी जिलों में लागू किया जाए।
अदालत ने कहा कि—
• वीडियोग्राफी से जांच अधिक प्रमाणिक बनती है
• अदालतों को मजबूत साक्ष्य उपलब्ध होते हैं
• फर्जी बरामदगी के आरोपों पर रोक लगती है
• निर्दोष व्यक्तियों को बेवजह फंसाए जाने की संभावना घटती है
पीठ ने यह भी संकेत दिया कि निर्देशों के उल्लंघन पर जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।
अदालती आदेश को पुलिस प्रशासन के लिए जांच प्रक्रिया में बड़ा सुधारात्मक कदम माना जा रहा है।
