जबलपुर, 27 जनवरी 2026। धार्मिक परंपरा और आध्यात्मिक उत्तराधिकार को लेकर उठे विवाद के बीच संत समाज का बड़ा वर्ग शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती के समर्थन में खुलकर सामने आया है। विभिन्न मठों और अखाड़ों से जुड़े संतों ने कहा कि शंकराचार्य पद की मान्यता सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा से तय होती है और इसमें बाहरी हस्तक्षेप उचित नहीं है।
संतों का कहना है कि धर्माचार्यों की परंपरा का सम्मान बनाए रखना सनातन व्यवस्था की मूल भावना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य पद किसी प्रशासनिक कागज़ी प्रक्रिया का विषय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्तराधिकार का हिस्सा है।
स्वामी सदानंद सरस्वती के हालिया वक्तव्य के बाद संतों ने एकजुटता दिखाते हुए कहा कि धार्मिक निर्णय धर्म परंपरा के अनुसार ही होने चाहिए। कई संतों ने इसे “धर्म की गरिमा” से जुड़ा विषय बताया।
इस घटनाक्रम के बाद धार्मिक संगठनों में चर्चा तेज हो गई है और संत समाज ने संकेत दिए हैं कि वे परंपरा की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से आवाज उठाते रहेंगे।

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