लखनऊ। उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में दायर हलफनामे में स्पष्ट किया है कि पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण से संबंधित प्रक्रिया पूरी होने से पहले चुनाव कराना न्यायालयीय निर्देशों के अनुरूप नहीं होगा। ऐसे में पंचायत चुनावों के टलने की संभावना प्रबल मानी जा रही है।
सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ की प्रक्रिया के अंतर्गत ओबीसी आरक्षण लागू करने से पूर्व समर्पित आयोग द्वारा सर्वेक्षण कर विस्तृत रिपोर्ट देना आवश्यक है। वर्तमान में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पुनर्गठन और सर्वे प्रक्रिया को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट न होने के कारण अंतिम आरक्षण सूची जारी नहीं हो सकी है।
सूत्रों के अनुसार ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल क्रमशः मई और जुलाई माह में समाप्त हो रहा है। यदि निर्धारित अवधि तक चुनाव प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो पाती है तो प्रदेश की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों, 826 क्षेत्र पंचायतों तथा 75 जिला पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्था के तहत प्रशासक नियुक्त किए जा सकते हैं।
राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार जानबूझकर चुनाव प्रक्रिया में विलंब कर रही है, जबकि सत्तारूढ़ दल का कहना है कि वह न्यायालय के आदेशों और संवैधानिक प्रावधानों का पूर्ण पालन करना चाहती है।
राजधानी लखनऊ में शासन स्तर पर बैठकों का सिलसिला जारी है। संबंधित विभागों को आवश्यक आंकड़े जुटाने और आयोग की रिपोर्ट शीघ्र तैयार कराने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासनिक सूत्रों का मानना है कि आरक्षण सूची को अंतिम रूप मिलने के बाद ही राज्य निर्वाचन आयोग आगे की चुनावी रूपरेखा घोषित करेगा।
कुल मिलाकर, ओबीसी आरक्षण की नई गणना और कानूनी स्पष्टता मिलने तक पंचायत चुनावों पर असमंजस की स्थिति बनी रह सकती है। प्रदेश भर के संभावित प्रत्याशी और राजनीतिक दल अब अदालत की अगली सुनवाई और सरकार के अंतिम निर्णय पर निगाहें टिकाए हुए हैं।
