मेरठ, 2 मार्च 26। जनपद में उस समय विवाद खड़ा हो गया जब शहर क्षेत्र के सर्किल ऑफिसर (सीओ) द्वारा जारी एक आदेश में पत्रकारों के थानों और कुछ संवेदनशील स्थलों पर प्रवेश को पूर्व अनुमति से जोड़ दिया गया। आदेश सार्वजनिक होते ही मीडिया संगठनों और नागरिक समाज के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।
बताया गया है कि सीओ कार्यालय से जारी निर्देश में स्पष्ट किया गया कि किसी भी आपराधिक घटना, छापेमारी या संवेदनशील प्रकरण की रिपोर्टिंग से पहले संबंधित अधिकारी की अनुमति अनिवार्य होगी। बिना अनुमति प्रवेश को अनुशासनहीनता मानते हुए कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
मीडिया जगत ने इसे सीधे तौर पर “तुगलकी आदेश” बताते हुए सीओ की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि पुलिस कार्यवाही की पारदर्शिता सुनिश्चित करना मीडिया का दायित्व है, ऐसे में प्रवेश पर रोक लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
मेरठ प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने आपात बैठक कर इस आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की। प्रेस क्लब के अध्यक्ष ने कहा कि यदि प्रशासन को व्यवस्था संबंधी चिंता है तो संवाद स्थापित किया जाए, न कि मीडिया पर प्रतिबंध लगाया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम स्वतंत्र रिपोर्टिंग को नियंत्रित करने की कोशिश प्रतीत होता है।
कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी इस आदेश को लेकर टिप्पणी की कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना तक पहुंच का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है। उनका कहना है कि किसी भी प्रकार का प्रतिबंध स्पष्ट कानूनी आधार और समयसीमा के साथ होना चाहिए।
उधर पुलिस प्रशासन का पक्ष है कि हाल के कुछ मामलों में जांच प्रभावित होने और भीड़ बढ़ने की शिकायतें मिली थीं, जिसके चलते यह व्यवस्था लागू की गई। अधिकारियों का दावा है कि यह स्थायी रोक नहीं बल्कि “प्रक्रिया सुव्यवस्थित” करने का प्रयास है।
हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि क्या ऐसी व्यवस्था संवाद और समन्वय से हल नहीं की जा सकती थी? जनपद में यह मुद्दा अब प्रशासन बनाम मीडिया की बहस का रूप ले चुका है।
