मुजफ्फरनगर। जानसठ क्षेत्र के जंधेड़ी गांव में कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा-द्वितीय की ओर से किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के प्रति जागरूक करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें कृषि विशेषज्ञों ने पराली जलाने से मिट्टी और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी देते हुए किसानों को कृषि यंत्रों और वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से अवशेषों के निस्तारण के तरीके समझाए। कार्यक्रम में लगभग 100 किसानों ने हिस्सा लिया।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रगतिशील किसान बाबूराम ने की। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. यशपाल सिंह ने कहा कि फसल कटाई के बाद खेत में बचे अवशेषों को आग लगाने के बजाय उनका उचित उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि अवशेषों को मिट्टी में मिलाने से जैविक पदार्थ बढ़ता है और खेत की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। साथ ही, इससे वायु प्रदूषण की समस्या को भी कम किया जा सकता है।कृषि वैज्ञानिक डॉ. रीना ने धान और गन्ने के अवशेषों के प्रबंधन के संबंध में किसानों को जानकारी दी। उन्होंने मल्चर, चॉपर, हैप्पी सीडर, जीरो टिलेज और सुपर सीडर जैसे कृषि उपकरणों के इस्तेमाल की प्रक्रिया बताई। इसके अलावा पूसा वेस्ट डीकंपोजर के जरिए फसल अवशेषों को खेत में ही जैविक रूप से विघटित करने की विधि भी समझाई।डॉ. पूजा ने किसानों को खेती में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया। फार्म मैनेजर संजीव कुमार और उत्तम राठी ने कृषि यंत्रों के संचालन और अवशेष प्रबंधन की व्यावहारिक जानकारी दी। इस दौरान किसानों ने विशेषज्ञों से सवाल पूछकर अपनी समस्याओं का समाधान जाना।कार्यक्रम के समापन पर किसानों से पराली नहीं जलाने और फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन को अपनाने की अपील की गई। आयोजकों ने कहा कि खेतों की सेहत बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण के लिए किसानों की भागीदारी जरूरी है।

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