नई दिल्ली। संसद के चालू सत्र में पेश किया गया 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका, जिससे केंद्र सरकार की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहल को झटका लगा है। यह विधेयक देश की संसदीय संरचना, परिसीमन प्रक्रिया और महिला आरक्षण जैसे अहम मुद्दों से जुड़ा हुआ था, जिसे लेकर सदन में व्यापक बहस देखने को मिली, लेकिन अंततः आवश्यक बहुमत के अभाव में इसे मंजूरी नहीं मिल पाई।
बताया जा रहा है कि इस संशोधन विधेयक के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था, ताकि देश की बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित थे, जिसमें संसद को यह अधिकार देने की बात शामिल थी कि वह तय करे कि परिसीमन कब और किस जनगणना के आधार पर लागू किया जाए।
विधेयक में महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण देने की दिशा में भी प्रावधानों को सरल बनाने का प्रयास किया गया था, ताकि इस व्यवस्था को शीघ्र लागू किया जा सके। हालांकि, इन प्रस्तावों को लेकर विपक्षी दलों ने कई गंभीर आपत्तियां उठाईं। खासतौर पर परिसीमन के मुद्दे पर राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल खड़े किए गए।
सदन में चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष ने इस विधेयक को देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने वाला कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में लाया गया प्रस्ताव करार देते हुए कई बिंदुओं पर पुनर्विचार की मांग की। लंबी बहस के बाद जब विधेयक को पारित कराने के लिए मतदान कराया गया, तो यह आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका और इसी के साथ यह प्रस्ताव फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विधेयक यदि पारित हो जाता तो देश की चुनावी व्यवस्था और प्रतिनिधित्व के स्वरूप में बड़े बदलाव संभव थे। फिलहाल इसके पारित न हो पाने को सरकार के लिए एक राजनीतिक झटका माना जा रहा है, हालांकि आने वाले समय में संशोधित स्वरूप में इसे दोबारा पेश किए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
