मुज़फ्फरनगर। यह सवाल अब पूरे जनपद में गूंज रहा है कि क्या आम नागरिक को अपनी बात सुनवाने के लिए अर्धनग्न होना पड़ेगा? प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर प्रशासन की चुप्पी उस समय टूटी, जब एक युवक अजय पंडित अपनी जान जोखिम में डालते हुए टावर पर चढ़ गया। इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता विजय हिंदुस्तानी ने अर्धनग्न होकर विरोध दर्ज कराया और फिर भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के किसानों ने भी यही तरीका अपनाया। तब जाकर सरकारी तंत्र हरकत में आया।
लंबे समय से आरडीएफ और बाहरी ठोस कचरे से फैल रहे प्रदूषण को लेकर ज्ञापन, शिकायतें और नियमों का हवाला दिया जाता रहा, लेकिन सब बेअसर साबित हुआ। जब सड़क पर असामान्य और कठोर विरोध हुआ, तभी प्रशासन ने आरडीएफ के परिवहन व उपयोग पर रोक के निर्देश जारी किए।
यह फैसला भले ही जनहित में हो, लेकिन इससे सिस्टम की संवेदनहीनता उजागर हो गई है। सवाल यह है कि क्या मुज़फ्फरनगर में काम कराने, सांस लेने लायक हवा मांगने और कानून लागू कराने के लिए नागरिकों को अपनी गरिमा दांव पर लगानी होगी? यह घटना केवल प्रदूषण की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है, जो शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों को तब तक अनदेखा करती है, जब तक हालात तमाशा न बन जाए।

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