मुजफ्फरनगर(आकाश तायल)। उच्च शिक्षा संस्थानों में भारतीय मूल्यों और आधुनिक दृष्टिकोण के समन्वय को लेकर बुधवार को सनातन धर्म कॉलेज में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक आयोजन हुआ, जिसमें “विकसित भारत @2047” के लक्ष्य को केंद्र में रखते हुए गहन मंथन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने देश के भविष्य के विकास मॉडल पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का शुभारम्भ पारंपरिक विधि-विधान के साथ हुआ, जिसके बाद विषय पर केंद्रित विचार-विमर्श का सिलसिला शुरू हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित शिक्षाविद् डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र ने भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बताते हुए कहा कि देश की प्रगति का आधार हमेशा से समावेशी सोच और सामाजिक सहभागिता रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो उसी मूल दर्शन को आधुनिक नीतियों के साथ अपनाना होगा।


उन्होंने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि विकास केवल आर्थिक सूचकांकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के हर वर्ग—विशेषकर युवा, महिलाएं, किसान और वंचित तबकों—को इसमें समान भागीदारी मिलनी चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीकी नवाचार और पारदर्शी प्रशासन को उन्होंने विकास की दिशा तय करने वाले प्रमुख क्षेत्र बताया।
कार्यक्रम के संचालनकर्ता डॉ. पीयूष शर्मा ने शिक्षा व्यवस्था की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब तक शिक्षा में भारतीयता और गुणवत्ता का संतुलित समावेश नहीं होगा, तब तक विकसित भारत का लक्ष्य अधूरा रहेगा। उन्होंने विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ-साथ मूल्य आधारित शिक्षा अपनाने की प्रेरणा दी।
अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार साझा करते हुए भारतीय परम्पराओं और आधुनिक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सहभागिता रही, जिससे आयोजन एक सार्थक अकादमिक संवाद के रूप में सामने आया।
अंत में, उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने यह संकल्प लिया कि भारतीय ज्ञान परम्परा को आधुनिक शिक्षा और नीतियों में समाहित कर देश को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में सक्रिय योगदान दिया जाएगा।

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