मेरठ। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता को लेकर वर्ष 2010 तथा उत्तर प्रदेश में 27 जुलाई 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) की अधिसूचनाओं, शिक्षा का अधिकार अधिनियम में हुए संशोधनों और हाल के न्यायिक निर्णयों के बाद बड़ी संख्या में शिक्षक अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।अखिल राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए केंद्र और राज्य सरकार से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से स्थायी राहत देने की मांग की है। संगठन का कहना है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति उस समय लागू नियमों और निर्धारित योग्यता के आधार पर की गई थी, उन पर बाद में लागू की गई शर्तों को प्रभावी करना उचित नहीं होगा।महासंघ के पदाधिकारियों का कहना है कि ये शिक्षक वर्षों से शिक्षा व्यवस्था में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और छात्रों के भविष्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में उनकी सेवा सुरक्षा, पदोन्नति, वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभ प्रभावित नहीं होने चाहिए।संगठन ने मांग की है कि 23 अगस्त 2010 तथा उत्तर प्रदेश में 27 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए सरकार स्पष्ट नीति बनाए। साथ ही आवश्यक होने पर विधायी संशोधन या विशेष प्रावधान कर उन्हें कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाए।महासंघ का कहना है कि यदि इस विषय पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो बड़ी संख्या में शिक्षकों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है। इसका असर शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। संगठन ने सरकार से इस मामले में शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेकर शिक्षकों की शंकाओं का समाधान करने की अपील की है।शिक्षक संगठनों का मानना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के अधिकारों और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को जल्द स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए, ताकि किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।

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